नौणी विश्वविद्यालय और देव संस्कृति विश्वविद्यालय अपशिष्ट से संपदा आधारित अनुसंधान एवं शिक्षा में सहयोग की संभावनाएं तलाशेंगे – भारत केसरी टीवी

नौणी विश्वविद्यालय और देव संस्कृति विश्वविद्यालय अपशिष्ट से संपदा आधारित अनुसंधान एवं शिक्षा में सहयोग की संभावनाएं तलाशेंगे

[मदन शर्मा ]

Advertisement

 

Advertisement

नौणी विश्वविद्यालय और देव संस्कृति विश्वविद्यालय अपशिष्ट से संपदा आधारित अनुसंधान एवं शिक्षा में सहयोग की संभावनाएं तलाशेंगे

नौणी/हरिद्वार: सतत नवाचार को बढ़ावा देने तथा मूल्य संवर्धन एवं पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर अनुसंधान को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के एक प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को हरिद्वार स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय (डीएसवीवी) का दौरा किया। यह यात्रा अनुसंधान, शिक्षा, प्रौद्योगिकी के व्यवसायीकरण तथा उद्यमिता विकास के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं को तलाशने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई।

दोनों संस्थान अपने-अपने क्षेत्रों में विशिष्ट पहचान रखते हैं। औद्यानिकी, वानिकी एवं खाद्य प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नौणी विवि एक अग्रणी संस्थान है, जबकि डी.एस.वी.वी. पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों के वैज्ञानिक प्रमाणीकरण, औषधीय रसायन विज्ञान तथा पंचगव्य के चिकित्सीय अनुप्रयोगों पर अपने अग्रणी कार्य के लिए जाना जाता है।

प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कुलपति डॉ. एच.एस. बवेजा ने किया। प्रतिनिधिमंडल में अनुसंधान निदेशक डॉ. देविना वैद्य, वानिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. सी.एल. ठाकुर, पादप रोग विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल हांडा, पुष्प विज्ञान एवं भू-दृश्य वास्तुकला विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बी.एस. दिल्टा, संयुक्त अनुसंधान निदेशक डॉ. विशाल राणा तथा सिल्वीकल्चर एवं कृषि वानिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. रोहित वशिष्ठ शामिल थे।

प्रस्तावित सहयोग का उद्देश्य पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक एवं प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों के साथ जोड़कर गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, नवाचार आधारित अनुसंधान तथा औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए एक सशक्त पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है। विशेष रूप से गो-आधारित बाइ प्रोडक्ट, खासकर गोबर एवं गोमूत्र, के मूल्य संवर्धन तथा उन्नत प्रसंस्करण तकनीकों के विकास और उनकी व्यावसायिक संभावनाओं के दोहन पर बल दिया जाएगा।

दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने डी.एस.वी.वी. के विभिन्न विभागों के वैज्ञानिकों एवं विषय विशेषज्ञों के साथ विस्तृत चर्चा की। टीम ने उन्नत गोपालन केंद्रों तथा गोबर एवं गोमूत्र के उपयोग से संबंधित विशेष प्रसंस्करण इकाइयों का भी दौरा किया। इसके अलावा प्रतिनिधिमंडल ने उन इकाइयों का निरीक्षण किया जहां इन जैविक संसाधनों का उपयोग कर कपड़े और कागज जैसे पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जो परिपत्र अर्थव्यवस्था तथा अपशिष्ट से संपदा आधारित उद्यमिता के सफल मॉडल प्रस्तुत करते हैं।

कुलपति डॉ. एच.एस. बवेजा ने डी.एस.वी.वी. के प्रति-कुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या के साथ एक बैठक भी की। दोनों पक्षों ने संस्थागत सहयोग की संभावनाओं तथा व्यापक समझौता ज्ञापन (एमओयू) के माध्यम से साझेदारी को औपचारिक रूप देने पर विचार-विमर्श किया।

दौरे का एक प्रमुख आकर्षण डी.एस.वी.वी. के विद्यार्थियों एवं युवा उद्यमियों के साथ आयोजित संवादात्मक सत्र रहा। प्रतिनिधिमंडल ने देखा कि किस प्रकार कौशल विकास और नवाचार के माध्यम से युवा जैविक अपशिष्ट को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में परिवर्तित कर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों की आवश्यकताओं को पूरा कर रहे हैं। अनुभवात्मक शिक्षा एवं उद्यमिता का यह मॉडल आत्मनिर्भर भारत तथा सतत संपदा सृजन के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप है।

प्रस्तावित सहयोग से वानिकी शिक्षा, खाद्य विज्ञान, मूल्य संवर्धन तथा सतत ग्रामीण उद्यमिता के क्षेत्र में नए अवसर सृजित होने की उम्मीद है। साथ ही, यह देश में अभिनव अपशिष्ट से संपदा प्रौद्योगिकियों तथा पर्यावरण-अनुकूल व्यावसायिक मॉडलों के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

व्हाट्सप्प आइकान को दबा कर इस खबर को शेयर जरूर करें

विज्ञापन बॉक्स (विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें)


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे
Donate Now
               
हमारे  नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट , और सभी खबरें डाउनलोड करें
डाउनलोड करें

जवाब जरूर दे 

2027 में कौन होगा हिमाचल का मुख्य मंत्री

View Results

Loading ... Loading ...


Related Articles

Close
Facebook Instagram Twitter Youtube Whatsapp
Website Design By Mytesta.com +91 8809666000