हिमाचल में परंपरागत घराटों का अस्तित्व संकट में — कुल्लू में तीन साल में 451 घराट लुप्त, अब मुश्किल से 500 बचे – भारत केसरी टीवी

हिमाचल में परंपरागत घराटों का अस्तित्व संकट में — कुल्लू में तीन साल में 451 घराट लुप्त, अब मुश्किल से 500 बचे

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कभी पहाड़ी जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे घराट (पानी से चलने वाले आटा चक्की) अब हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में इतिहास बनते जा रहे हैं। बीते तीन वर्षों में ही यहां 451 घराट बंद हो गए या पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। वर्तमान में जिले में मुश्किल से 500 घराट शेष हैं, जिनमें से केवल लगभग 200 ही किसी तरह चालू हालत में हैं।

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गड़सा घाटी जैसे इलाकों में आज भी कुछ घराटों की घर्र-घर्र आवाज सुनाई देती है, लेकिन कभी यह ध्वनि गांवों की जीवनधारा हुआ करती थी। इन घराटों के आसपास लोकगीत जन्म लेते थे, सामाजिक मेलजोल होता था, और प्रेमकथाएं गढ़ी जाती थीं। मगर समय के साथ आधुनिक तकनीक, मिलों के प्रसार और कृषि के स्वरूप में बदलाव ने इस परंपरा को लगभग मिटा दिया।

 

करीब ढाई दशक पहले कुल्लू में 2,500 से अधिक घराट सक्रिय थे। लेकिन जैसे-जैसे लोगों का रुझान पारंपरिक खेती से हटकर बागवानी और नकदी फसलों की ओर बढ़ा, घराटों की उपयोगिता घटती गई। अनाज की पिसाई घटने से घराट बंद पड़ने लगे, और प्राकृतिक आपदाओं ने इनका बचा-खुचा अस्तित्व भी छीन लिया।

 

अब कुल्लू के पहाड़ी नालों में बस कुछ ही घराट जिंदा हैं — वहीं, जहां लोग आज भी गेहूं, मक्की, जौ, कादरा और सलियारा जैसी पारंपरिक फसलें उगाते हैं। यह सिर्फ एक परंपरा का क्षय नहीं, बल्कि हिमाचल की लोकसंस्कृति के एक जीवंत अध्याय का अंत भी है।

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