“हाईकोर्ट की फटकार: बदले की राजनीति पर सुक्खू सरकार को झटका, कहा—कानून नहीं होते प्रतिशोध का हथियार” – भारत केसरी टीवी

“हाईकोर्ट की फटकार: बदले की राजनीति पर सुक्खू सरकार को झटका, कहा—कानून नहीं होते प्रतिशोध का हथियार”

[ मदन शर्मा]

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“बदले की भावना से कानून बनाकर विपक्ष को निशाना बनाने वाली सुक्खू सरकार को हाईकोर्ट का करारा तमाचा—न्यायालय ने कहा: कानून भविष्य के लिए होते हैं, बदले के लिए नहीं”

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“दो साल तक पूर्व विधायकों को परेशान किया, अब कोर्ट के आदेश से मिला न्याय—कांग्रेस की ‘बदले और भटकाव’ की राजनीति हुई बेनकाब”: आशीष शर्मा

 

शिमला:

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सुक्खू सरकार की राजनीति “समान दृष्टि” नहीं बल्कि “बदले की भावना” पर आधारित है। भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही झूठ गढ़ने, विपक्ष को निशाना बनाने और विरोध करने वाले नेताओं को परेशान करने की नीति अपनाई, लेकिन अब न्यायालय के फैसले ने उनके इस एजेंडे पर सीधा प्रहार किया है।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 07.04.2026 में स्पष्ट किया कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित संशोधन विधेयक की प्रभावशीलता पूर्व प्रभाव (retrospective) नहीं हो सकती और यह केवल भविष्य (prospective) के लिए ही लागू होगा।

न्यायालय ने साफ निर्देश दिए कि संबंधित पूर्व विधायकों को उनकी पेंशन एवं बकाया राशि एक माह के भीतर जारी की जाए, अन्यथा राज्य को 6% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करना होगा।

भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा ने तीखा प्रहार करते हुए कहा:

“यह फैसला सुक्खू सरकार के चेहरे पर तमाचा है। कांग्रेस ने कानून को बदले का हथियार बनाने की कोशिश की, लेकिन न्यायालय ने साफ कर दिया कि कानून किसी व्यक्ति विशेष को टारगेट करने के लिए नहीं बनाए जाते, बल्कि भविष्य के लिए बनाए जाते हैं।”

उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया 2024 का संशोधन बिल, जिसमें अयोग्य घोषित विधायकों (10वीं अनुसूची) की पेंशन रोकने का प्रयास किया गया, पूरी तरह राजनीतिक द्वेष से प्रेरित था। लेकिन सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसे वह बिल वापस लेना पड़ा। इसके बाद 2026 में नया संशोधन लाया गया, जिसकी सीमा केवल 14वीं विधानसभा के बाद के विधायकों तक सीमित रखी गई—यह स्वयं साबित करता है कि पहले किया गया कदम गलत और असंवैधानिक था।

आशीष शर्मा ने कहा कि:

“कांग्रेस सरकार ने दो वर्षों तक पूर्व विधायकों को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया। उनकी वैध पेंशन रोकी गई, उन्हें न्याय के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़े—यह लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण है।”

उन्होंने यह भी कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) का दुरुपयोग करते हुए पेंशन रोकने का प्रयास किया गया, जबकि यह प्रावधान केवल सदस्यता समाप्ति तक सीमित है, न कि पूर्व अधिकारों को समाप्त करने के लिए।

“कांग्रेस सरकार ने संविधान को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश की, लेकिन न्यायपालिका ने स्पष्ट कर दिया कि कानून के साथ ‘मनमानी’ नहीं चलेगी,” उन्होंने कहा।

आशीष शर्मा ने आगे कहा कि यह पूरा प्रकरण कांग्रेस सरकार की “Deflection Politics” का उदाहरण है—जहां अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए मुद्दों को भटकाया जाता है और विपक्ष को टारगेट किया जाता है।

“पहले दिन से ही कांग्रेस सरकार की एक ही सोच रही—झूठ कैसे गढ़ना है, विपक्ष को कैसे दबाना है और विरोध करने वालों को कैसे परेशान करना है। लेकिन अब अदालत ने सच्चाई सामने ला दी है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल पूर्व विधायकों की जीत नहीं, बल्कि Rule of Law, संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत है।

अंत में भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा इस मुद्दे को प्रदेश की जनता के बीच लेकर जाएगी और बताएगी कि कैसे कांग्रेस सरकार ने कानून का दुरुपयोग कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया।

“यह सरकार ‘बदले की भावना’ से चल रही है, न कि ‘समान दृष्टि’ से—और अब जनता भी इसका जवाब देने के लिए तैयार है,” उन्होंने निष्कर्ष में कहा।

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