सनातन धर्म के सभी भाई-बहनों के लिए विशेष धार्मिक सूचना! – भारत केसरी टीवी

सनातन धर्म के सभी भाई-बहनों के लिए विशेष धार्मिक सूचना!

[MADAN SHARMA]

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10 सितंबर 2026, दिन गुरुवार को इस वर्ष की सबसे पवित्र और फलदायी कुशाग्रहणी अमावस्या (भाद्रपद अमावस्या) पड़ रही है। सनातन परंपरा में इस तिथि का अत्यंत विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन वर्ष भर के धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ के लिए पवित्र ‘कुशा’ (एक विशेष प्रकार की घास) को उखाड़कर एकत्रित किया जाता है।

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कुशा उखाड़ने की सही विधि और नियम

कुशाग्रहणी अमावस्या के दिन तोड़ी गई कुशा पूरे एक वर्ष तक पवित्र मानी जाती है। यदि आप भी इस दिन कुशा एकत्रित कर रहे हैं, तो इन नियमों का पालन अवश्य करें:

सूर्योदय के समय: कुशा को सदैव प्रातःकाल सूर्योदय के समय ही तोड़ना चाहिए।

मंत्र का जाप: कुशा को उखाड़ते समय निरंतर “ॐ हुं फट् स्वाहा” मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करें।

एक ही झटके में खींचें: कुशा को बार-बार खींचकर परेशान न करें। मंत्र बोलते हुए एक ही झटके में जड़ सहित उखाड़ें।

सावधानी: कुशा तोड़ते समय चाकू, कैंची या लोहे के किसी भी उपकरण का उपयोग न करें। हाथों से ही उखाड़ना शुभ होता है।

कुशा की उत्पत्ति की कथा

धार्मिक ग्रंथों और पुराणों (विशेषकर मत्स्य पुराण और बराह पुराण) के अनुसार कुशा की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है:

समुद्र मंथन कथा: जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन हो रहा था, तब मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को नेती बनाया गया था। पर्वत के घर्षण को सहने के लिए भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुआ) अवतार धारण किया था।

विष्णु जी के रोम से उत्पत्ति: समुद्र मंथन की तीव्र रगड़ के कारण भगवान विष्णु के शरीर से जो रोम (बाल) टूटकर समुद्र के जल में और तट पर गिरे, वे ही धरती पर ‘कुशा’ के रूप में उत्पन्न हुए।

अमृत का स्पर्श: समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश को जब कुशा की घास पर रखा गया था, तब अमृत की कुछ बूंदें इस पर गिर गई थीं। इसी कारण कुशा को अमर, नित्य पवित्र और कभी बासी न होने वाली औषधि-स्वरुप घास माना जाता है।

कुशा को पवित्र क्यों माना जाता है?

त्रिदेवों का वास: कुशा के मूल (जड़) में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग (शिखा) में भगवान शिव का वास माना जाता है।

पूजा और पितृ कार्य में अनिवार्य: बिना कुशा के की गई पूजा, जप, हवन और श्राद्ध का फल पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं होता। कुशा की अंगूठी (पवित्री) पहनकर ही अनामिका उंगली से जल अर्पण और पूजा की जाती है।

सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह: वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टिकोणों से कुशा ऊर्जा की कुचालक होती है। जब हम कुशा के आसन पर बैठकर पूजा या ध्यान करते हैं, तो शरीर की आध्यात्मिक ऊर्जा धरती में समाहित नहीं होती।

इस पावन अवसर पर नियमों का पालन करते हुए कुशा एकत्रित करें और अपने घर में सुख-समृद्धि एवं पवित्रता का आगमन करें।

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