शूलिनी विवि  में ‘इंटरफेथ हार्मनी सिम्पोजियम’ (विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव पर संगोष्ठी) में एकता, करुणा और सामाजिक सद्भाव पर ज़ोर दिया गया। – भारत केसरी टीवी

शूलिनी विवि  में ‘इंटरफेथ हार्मनी सिम्पोजियम’ (विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव पर संगोष्ठी) में एकता, करुणा और सामाजिक सद्भाव पर ज़ोर दिया गया।

[मदन शर्मा ]

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सोलन, 19 जून
शूलिनी यूनिवर्सिटी के ‘योगानंद सेंटर ऑफ़ स्पिरिचुअल साइंसेज’ के सहयोग से ‘फैकल्टी ऑफ़ लीगल साइंसेज’ ने शुक्रवार को ‘इंटरफेथ हार्मनी सिम्पोजियम’ का आयोजन किया। इसमें जाने-माने कानून विशेषज्ञ, राजनयिक, पूर्व सैनिक, शिक्षाविद और विचारक शामिल हुए और विभिन्न धर्मों के बीच समझ, सम्मान और सद्भाव के महत्व पर चर्चा की।
इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य तेज़ी से विविधतापूर्ण हो रहे समाज में सहानुभूति, करुणा, शांति और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम के विषय की शुरुआत करते हुए, पूर्व IAS अधिकारी  विवेक अत्रे ने “हमारे समय के विरोधाभास” (Dichotomies of Our Times) पर बात की और उन विभाजनों से ऊपर उठने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया जो अक्सर सार्वजनिक चर्चाओं को आकार देते हैं। सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और छोटे डिजिटल कंटेंट के बढ़ते प्रभाव का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ध्रुवीकरण से निपटने और लोगों के बीच बेहतर समझ बनाने के लिए आत्म-जागरूकता, आलोचनात्मक सोच और व्यापक दृष्टिकोण विकसित करना ज़रूरी है।
पहली पैनल चर्चा का संचालन लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) के. जे. सिंह (रिटायर्ड) ने किया और इसका विषय था “सशस्त्र बलों और नागरिक समाज के बीच अंतर-धार्मिक संवाद।”
डॉ. मोहम्मद खालिद ने कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों ने हमेशा धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बनाए रखा है और सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करके उन्हें समाज के लिए एक मिसाल पेश करनी चाहिए।
लेफ्टिनेंट कर्नल रविंदर जीत रंधावा (रिटायर्ड) ने कहा कि देश की सेवा करते समय भारतीय सैनिक धर्म, जाति, नस्ल और पृष्ठभूमि के अंतर से ऊपर उठकर काम करते हैं। चर्चा में एकता, समावेशिता और आपसी सम्मान के उन मूल्यों पर प्रकाश डाला गया जो सशस्त्र बलों की नींव हैं।
दूसरी पैनल चर्चा का विषय था “सभी धर्म सहानुभूति, करुणा, प्रेम और शांति के धर्म हैं।” ‘इंटरफेथ’ के उपाध्यक्ष  गुरप्रीत सिंह द्वारा संचालित इस सत्र में जस्टिस के. एस. गरेवाल (रिटायर्ड), राजदूत अशोक कुमार, IFS (रिटायर्ड), जस्टिस सबीहुल हसनैन (रिटायर्ड) और शूलिनी यूनिवर्सिटी के चांसलर प्रो. (डॉ.) पी. के. खोसला शामिल हुए।
 गुरप्रीत सिंह ने धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान करने के महत्व पर ज़ोर दिया। जस्टिस के. एस. गरेवाल ने कहा कि मानवता एक है और सभी धर्म अंततः मानव कल्याण के लिए काम करते हैं।
राजदूत अशोक कुमार IFS (रिटायर्ड) ने मतभेदों से ऊपर मानवता को रखने और ऐसे मूल्यों को अपनाने पर ज़ोर दिया जो अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के लोगों को जोड़ते हैं।
प्रोफ़ेसर पी. के. खोसला ने अच्छे कामों और निस्वार्थ सेवा के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि धर्म एक व्यक्तिगत मामला है और लोगों को दूसरों की मदद करने और समाज में सकारात्मक योगदान देने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि दया, करुणा और ईमानदारी ऐसे मूल्य हैं जो सभी धर्मों में समान रूप से पाए जाते हैं।
जस्टिस सबीहुल हसनैन ने लोगों को पहले अपने धर्म को गहराई से समझने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि सही समझ से दूसरों के प्रति सम्मान बढ़ता है और सामाजिक सद्भाव मज़बूत होता है। उन्होंने विवादों को सुलझाने और शांतिपूर्ण समुदाय बनाने में बातचीत और सामूहिक समझ के महत्व पर भी ज़ोर दिया।
वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि भले ही धर्मों के रीति-रिवाज़ अलग-अलग हों, लेकिन उनमें करुणा, शांति, सहनशीलता और सह-अस्तित्व जैसे साझा मूल्य होते हैं। उन्होंने सामाजिक सद्भाव को मज़बूत करने के लिए लगातार बातचीत और आपसी समझ की ज़रूरत पर बल दिया।
इस कार्यक्रम का संचालन और एंकरिंग लीगल साइंसेज़ फैकल्टी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर  युगाशा  और  निधि सिंह ने किया। कार्यक्रम का समापन कर्नल डी. एस. चीमा (रिटायर्ड) के समापन भाषण के साथ हुआ, जिसके बाद एक इंटरैक्टिव सेशन और धन्यवाद प्रस्ताव हुआ। कर्नल डी. एस. चीमा (रिटायर्ड) ने कहा कि इस संगोष्ठी ने इस संदेश को और मज़बूत किया कि शांतिपूर्ण, समावेशी और सौहार्दपूर्ण समाज बनाने के लिए समझ, सम्मान और करुणा ज़रूरी हैं।

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