“बेटे की राह तकते रहे, पर वो नहीं आया – अस्पताल में अकेले बुजुर्ग ने तोड़ा दम” – भारत केसरी टीवी

“बेटे की राह तकते रहे, पर वो नहीं आया – अस्पताल में अकेले बुजुर्ग ने तोड़ा दम”

यह घटना न केवल दर्दनाक है, बल्कि समाज के बदलते व्यवहार का एक चिंताजनक संकेत भी है। एक पिता, जिसने अपने बेटे के लिए जीवन भर संघर्ष किया, आखिरकार उसी बेटे की बेरुखी का शिकार हो गया। चार महीने तक अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए उन्होंने अपने बेटे के आने का इंतजार किया, लेकिन वह नहीं आया। और जब उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, तब भी बेटा कंधा देने तक नहीं पहुंचा।

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यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि समाज में बढ़ती संवेदनहीनता को दर्शाने वाला एक कठोर सत्य है। आधुनिक जीवनशैली, स्वार्थ और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं ने रिश्तों की गरिमा को कमजोर कर दिया है। माता-पिता, जो अपने बच्चों की परवरिश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं, बुढ़ापे में अक्सर अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करते हैं।

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यह घटना हम सभी के लिए एक चेतावनी है। हमें आत्ममंथन करने की जरूरत है कि क्या हम भी कहीं रिश्तों को नज़रअंदाज़ करने की राह पर तो नहीं चल रहे? समाज में जागरूकता और नैतिक मूल्यों को फिर से मजबूत करना जरूरी है, ताकि कोई भी बुजुर्ग अपने आखिरी समय में अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार न हो।

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