सुक्खू सरकार’ के प्रयासों से आर्थिक समृद्धि की नई गाथा लिख रहे हैं जिला के किसान – भारत केसरी टीवी

सुक्खू सरकार’ के प्रयासों से आर्थिक समृद्धि की नई गाथा लिख रहे हैं जिला के किसान

[MADAN SHARMA]

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प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में अग्रणी बनकर उभर रहा जिला मंडी*

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*मंडी, 09 अगस्त।* प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने तथा किसानों को रसायनमुक्त खेती की ओर प्रेरित करने के ‘सुक्खू सरकार’ के प्रयास रंग ला रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी से किसानों का रूझान इस ओर बढ़ा है। मंडी जिला में भी किसान बड़ी संख्या में इससे जुड़ रहे हैं।

 

जिला में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत व्यापक कार्य योजना तैयार की गई है। मिशन का मुख्य उद्देश्य रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देना, सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान्न का उत्पादन सुनिश्चित करना, मिट्टी की उर्वरता एवं जैविक गुणवत्ता में सुधार लाना तथा किसानों की लागत कम कर टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित करना है।

 

मंडी में प्राकृतिक खेती का बढ़ता दायरा

 

जिला में वर्तमान में 48,380 किसान प्राकृतिक खेती से जुड़े हैं तथा 8,400 हेक्टेयर भूमि प्राकृतिक खेती के अंतर्गत लाई जा चुकी है। वर्ष 2025-26 के दौरान 2,500 हेक्टेयर क्षेत्र, 50 क्लस्टर तथा 8,214 किसानों को योजना से जोड़ा गया। वहीं वर्ष 2026-27 में 1,000 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र, 20 नए क्लस्टर तथा 2,500 नए किसानों को योजना से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

 

गत दो वर्षों में कृषि विभाग द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत 1040.81 क्विंटल मक्का, 644.24 क्विंटल गेहूं तथा लगभग 233 क्विंटल हल्दी की खरीद की गई है, जिससे किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त हुआ है।

 

एमएसपी में वृद्धि किसानों के लिए लाभकारी

 

गांव घांघल के किसान प्रताप सिंह ने बताया कि आत्मा परियोजना के तहत प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती शुरू की। पहले गेहूं के साथ मटर और चने की मिश्रित खेती की, जिससे अच्छी पैदावार हुई। पहले उन्हें गेहूं का मूल्य 60 रुपये प्रति किलोग्राम मिलता था, जबकि अब 80 रुपये प्रति किलोग्राम प्राप्त हो रहा है। इसी प्रकार मक्की का मूल्य भी 40 रुपये से बढ़कर 60 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया है। उनका कहना है कि राज्य सरकार द्वारा एमएसपी में की गई वृद्धि किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुई है, जिसके लिए वे मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के सदैव आभारी रहेंगे।

 

सुंदरनगर तहसील के गांव ढंडोल के मस्तराम ने मक्की, सोयाबीन, अदरक तथा हल्दी की खेती शुरू की। इस वर्ष उन्होंने एक बीघा भूमि पर ड्रैगन फ्रूट के पौधे भी लगाए हैं। उन्होंने पांच बीघा भूमि पर प्राकृतिक खेती कर लगभग 65 हजार रुपये का गेहूं तथा 25 हजार रुपये की मक्की सरकार को बेची। उनका कहना है कि हल्दी के समर्थन मूल्य में 90 रुपये से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम करने से किसानों को बड़ा लाभ मिला है जिसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री का धन्यवाद व्यक्त किया।

 

4.93 करोड़ रुपये की वार्षिक कार्य योजना

 

वर्ष 2026-27 के लिए लगभग 4.93 करोड़ रुपये की कार्ययोजना प्रस्तावित की गई है। इसके अंतर्गत नए कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (सीआरपी) की नियुक्ति, किसानों के प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम, प्रोत्साहन राशि, प्राकृतिक खेती का प्रमाणन, अध्ययन सामग्री एवं किट वितरण, 13 बायो रिसोर्स सेंटर (बीआरसी) की स्थापना तथा मिशन प्रबंधन एवं निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा।

 

जिले में 13 बायो रिसोर्स सेंटर स्थापित किए जाएंगे

 

जिले के 14 विकास खंडों के 20 नए क्लस्टरों के लिए नए सीआरपी का चयन किया गया है। ये किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों का प्रशिक्षण देंगे, खेतों में प्रदर्शन करेंगे तथा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन में सहयोग करेंगे। प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक जीवामृत, घन जीवामृत एवं अन्य जैविक संसाधनों की स्थानीय स्तर पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जिले में 13 बायो रिसोर्स सेंटर स्थापित किए जाएंगे, जहां किसानों को आवश्यक सामग्री एवं तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाएगा।

 

किसानों को मिल रही आर्थिक सहायता

 

उप परियोजना निदेशक (आत्मा) मंडी हितेंद्र कुमार के अनुसार प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को स्वदेशी नस्ल की गाय खरीदने पर 25 हजार रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। गोमूत्र संग्रहण के लिए गौशाला का फर्श पक्का करने को 8 हजार रुपये तथा जीवामृत एवं घन जीवामृत तैयार करने को तीन ड्रमों पर 2,250 रुपये का अनुदान दिया जा रहा है। किसानों को प्राकृतिक खेती का निःशुल्क प्रशिक्षण, किट तथा तकनीकी मार्गदर्शन दिया जाता है।

 

प्रदेश में प्राकृतिक खेती को नई गति देने में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू की पहल निर्णायक साबित हो रही है। प्राकृतिक खेती से उत्पादित फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि के बाद किसानों का इस खेती पद्धति के प्रति विश्वास और उत्साह दोनों बढ़े हैं। बेहतर दाम मिलने से किसान अब प्राकृतिक खेती को केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि लाभकारी कृषि व्यवसाय के रूप में भी देख रहे हैं।

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