नकदी विवाद में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार, याचिका को बताया अनुचित – भारत केसरी टीवी

नकदी विवाद में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार, याचिका को बताया अनुचित

नई दिल्ली (भारत केसरी टीवी)

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को न्यायपालिका की गरिमा और आंतरिक जांच प्रक्रियाओं को चुनौती देने वाले एक असाधारण मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा को जमकर फटकार लगाई। नकदी बरामदगी से जुड़े विवाद में आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को रद्द करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि “यह याचिका दाखिल ही नहीं होनी चाहिए थी।”

⚖️ क्या है मामला?

जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित आंतरिक जांच समिति की उस रिपोर्ट को रद्द करने की मांग की थी, जिसमें उन्हें नकदी से जुड़े एक गंभीर मामले में दोषी माना गया है।

यह याचिका जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की दो-न्यायाधीशीय पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए प्रस्तुत हुई।

🔴 सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी:

पीठ ने सुनवाई शुरू होते ही याचिका के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा:

> “जिस राहत की मांग की गई है, वह सुप्रीम कोर्ट की संरचना और प्रक्रिया के ही खिलाफ है।”

इसके साथ ही अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि जस्टिस वर्मा इस रिपोर्ट को चुनौती दे रहे हैं तो उन्होंने उस रिपोर्ट की प्रति याचिका के साथ क्यों नहीं लगाई?

🧾 वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की दलीलें:

जस्टिस वर्मा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि

संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत न्यायाधीशों के आचरण पर सार्वजनिक टिप्पणी नहीं हो सकती।

जांच की गोपनीयता और प्रक्रिया की मर्यादा बनाए रखना ज़रूरी है।

मीडिया ट्रायल और वीडियो फुटेज सार्वजनिक करना न्यायपालिका की गरिमा के विपरीत है।

❓ सुप्रीम कोर्ट का पलटवार:

अदालत ने कटाक्ष करते हुए सवाल किया:

> “यदि जांच समिति असंवैधानिक थी तो आप उसके सामने पेश ही क्यों हुए?”
“क्या यह सोचकर गए थे कि फैसला आपके पक्ष में आ सकता है?”

📌 मामले का व्यापक प्रभाव:

यह मामला अब न सिर्फ एक व्यक्तिगत याचिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका की आंतरिक जवाबदेही, गोपनीय जांच प्रक्रिया और न्यायाधीशों की पारदर्शिता को लेकर भी नई बहस को जन्म दे चुका है।

📌 मामले का व्यापक प्रभाव:

यह मामला अब न सिर्फ एक व्यक्तिगत याचिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका की आंतरिक जवाबदेही, गोपनीय जांच प्रक्रिया और न्यायाधीशों की पारदर्शिता को लेकर भी नई बहस को जन्म दे चुका है।

📺 भारत केसरी टीवी विशेष रिपोर्ट
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