नौणी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सेब बागानों का किया निरीक्षण, रोग नियंत्रण को लेकर जारी की एडवाइजरी – भारत केसरी टीवी

नौणी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सेब बागानों का किया निरीक्षण, रोग नियंत्रण को लेकर जारी की एडवाइजरी

[मदन शर्मा]

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नौणी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सेब बागानों का किया निरीक्षण, रोग प्रबंधन को लेकर जारी की सलाह

 

डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (यूएचएफ) के विभिन्न वैज्ञानिक दल पिछले दो सप्ताह से हिमाचल प्रदेश के प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में लगातार क्षेत्रीय भ्रमण एवं जागरूकता अभियान चला रहे हैं। इन अभियानों का उद्देश्य बागवानों को अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट तथा सेब की अन्य महत्वपूर्ण बीमारियों के वैज्ञानिक प्रबंधन के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करना है। 8 जुलाई से चल रहे इस अभियान के दौरान वैज्ञानिकों के साथ उद्यान विभाग के अधिकारी भी शामिल रहे। टीमों ने विभिन्न बागानों का दौरा कर रोगों की स्थिति का आकलन किया तथा बागवानों से संवाद स्थापित किया।

जागरूकता शिविरों में अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, मार्सोनिना लीफ ब्लॉच, सेब स्कैब तथा अन्य बीमारियों की समय पर पहचान एवं वैज्ञानिक प्रबंधन पर विशेष बल दिया गया। वैज्ञानिकों ने पत्तियों के नमूनों की जांच कर रोगों एवं पोषक तत्वों की कमी का निदान किया तथा क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों के अनुसार सुझाव दिए। कुछ बागानों में मार्सोनिना लीफ ब्लॉच एवं अल्टरनेरिया रोग का हल्के स्तर पर प्रकोप पाया गया। वैज्ञानिकों ने जड़ सड़न, कॉलर रॉट, पत्तियों का पीला पड़ना, पौधों का मुरझाना तथा तने की छाल के सड़ने जैसी समस्याओं पर भी बागवानों के प्रश्नों का समाधान करते हुए खेत में उचित जल निकासी, जलभराव से बचाव तथा अनुशंसित प्रबंधन उपाय अपनाने की सलाह दी।

 

बागवानों के साथ हुई बातचीत के दौरान कई सामान्य प्रबंधन संबंधी कमियां सामने आईं। वैज्ञानिकों ने पाया कि बहुत कम बागवानों ने मिट्टी एवं पत्तियों की जांच करवाई थी तथा अधिकांश उर्वरकों का प्रयोग पारंपरिक अनुभव के आधार पर किया जा रहा था, जिससे पोषक तत्वों का असंतुलन उत्पन्न हो रहा है। कई बागानों में फॉस्फेट उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण जिंक की कमी के लक्षण भी देखे गए। यह भी पाया गया कि अनेक किसान आवश्यकता आधारित पौध संरक्षण उपायों के स्थान पर पोषक तत्वों के स्प्रे का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे थे अथवा तकनीकी सलाह के बिना उन्हें कीटनाशकों के साथ मिला रहे थे, जिससे स्प्रे की प्रभावशीलता कम होने के साथ-साथ कुछ मामलों में फाइट टॉक्सिसिटी (Phytotoxicity) का खतरा भी बढ़ गया है।

 

वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि अनेक बागवान विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित फफूंदनाशी स्प्रे अनुसूची का पालन नहीं कर रहे थे तथा पौध संरक्षण संबंधी निर्णय लेने में मुख्य रूप से कृषि रसायन विक्रेताओं की सलाह पर निर्भर थे। रोगों की पहचान में भी कई कमियां देखी गईं। कुछ बागवान फफूंदजनित रोगों और कीट अथवा माइट से होने वाले नुकसान में अंतर नहीं कर पा रहे थे, जिसके कारण फफूंदनाशकों के स्थान पर अनावश्यक रूप से कीटनाशकों अथवा माइटनाशकों का प्रयोग किया जा रहा था।

बागवानों के साथ संवाद के दौरान कुछ किसानों ने यह चिंता व्यक्त की कि विश्वविद्यालय की स्प्रे अनुसूची में अनुशंसित फफूंदनाशी अपेक्षित रोग नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं। इस पर विश्वविद्यालय के पादप रोग वैज्ञानिकों ने पाया कि अधिकांश मामलों में संक्रमण पत्ती की सतह (Leaf Lamina) के बजाय पेटीओल (Petiole) तक सीमित था। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि समस्या अनुशंसित फफूंदनाशकों की प्रभावशीलता में नहीं, बल्कि स्प्रे की सही तकनीक एवं पर्याप्त कवरेज में है। कई बागानों में फफूंदनाशी स्प्रे के बीच अनुशंसित 20 दिन का अंतराल भी नहीं रखा गया, जिससे रोग के प्रसार को बढ़ावा मिला।

वैज्ञानिकों ने बागवानों को सांस्कृतिक, जैविक एवं रासायनिक उपायों को समन्वित रूप से अपनाते हुए समेकित रोग प्रबंधन (Integrated Disease Management) अपनाने की सलाह दी।

 

किसानों से केवल अधिकृत एवं लाइसेंसधारी विक्रेताओं से ही कीटनाशक खरीदने तथा विश्वविद्यालय एवं बागवानी विभाग द्वारा अनुशंसित उत्पादों का ही उपयोग करने का आग्रह किया। साथ ही किसी भी तकनीकी सलाह को अपनाने से पहले उसकी पुष्टि करने तथा संदेहास्पद कीटनाशकों की सूचना संबंधित अधिकारियों को देने की भी अपील की।

मैदानी निरीक्षण के आधार पर विश्वविद्यालय ने सेब उत्पादकों के लिए निम्नलिखित सलाह जारी की है :

अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, मार्सोनिना लीफ ब्लॉच तथा अन्य रोगों की निरंतर निगरानी करें।
खरपतवार, संक्रमित पत्तियों एवं गिरी हुई पत्तियों को हटाकर बगीचे की स्वच्छता बनाए रखें। संक्रमित गिरी हुई पत्तियों को एकत्र कर उन पर 5 प्रतिशत यूरिया घोल का छिड़काव करें ताकि उनका शीघ्र अपघटन हो सके।
वैज्ञानिक विधि से छंटाई (प्रूनिंग) एवं कैनोपी प्रबंधन अपनाकर पर्याप्त वायु संचार एवं प्रकाश प्रवेश सुनिश्चित करे तथा जड़ रोगों, कैंकर एवं कीटों का समय पर प्रबंधन करें।
संतुलित पोषण प्रबंधन के लिए मिट्टी एवं पत्तियों की वैज्ञानिक जांच करवाएं। किसानों को मध्य जुलाई से मध्य अगस्त के बीच पत्तियों के नमूने तथा फसल कटाई के बाद मिट्टी के नमूने विश्लेषण हेतु भेजने की सलाह दी गई है।
विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित फफूंदनाशी स्प्रे अनुसूची का पालन करें तथा स्प्रे के बीच निर्धारित अंतराल बनाए रखें। फफूंदनाशकों को कीटनाशकों, सूक्ष्म पोषक तत्वों, वृद्धि नियामकों अथवा हार्मोनों के साथ बिना वैज्ञानिक अनुशंसा के न मिलाएं।
केवल अधिकृत विक्रेताओं से ही कीटनाशक खरीदें तथा विश्वविद्यालय एवं उद्यान विभाग द्वारा अनुमोदित उत्पादों का ही उपयोग करें।

 

रासायनिक प्रबंधन

रोकथाम हेतु (Prophylactic/Protective Spray):

· मेटिराम (Metiram) @ 600 ग्राम / 200 लीटर पानी या जिराम (Ziram) @ 500 ग्राम / 200 लीटर पानी।

अधिक रोग प्रकोप की स्थिति में:

Lustre 5% SE @ 160 मि.ली./200 लीटर पानी या Cabrio Top 60 WG @ 200 ग्राम/200 लीटर या Shamir @ 500 मि.ली./200 लीटर या Kohicap Plus @ 600 मि.ली./200 लीटर या Avtaar @ 500 ग्राम/200 लीटर या Merivon @ 50 मि.ली./200 लीटर या LUNA Experience @ 126 मि.ली./200 लीटर पानी।

वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि अनुशंसित मिश्रित फफूंदनाशकों का बारी-बारी से (Alternately) प्रयोग करें तथा उन्हें अन्य कीटनाशकों, सूक्ष्म पोषक तत्वों, वृद्धि नियामकों अथवा हार्मोनों के साथ न मिलाएं, क्योंकि इससे फाइट टॉक्सिसिटी, फलों पर रसेटिंग (Russeting) तथा दवाओं की प्रभावशीलता में कमी आ सकती है। आवश्यकता होने पर इनका अलग-अलग प्रयोग किया जाना चाहिए।

 

किसान रोग संबंधी लक्षणों के फोटो एवं अपने प्रश्न hodmpp@uhf.ac.in पर भेजकर विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों से तकनीकी मार्गदर्शन भी प्राप्त कर सकते हैं।

 

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