अर्बन नक्सल एक बड़ी चुनौती पहचाने की जरूरत : नंदा – भारत केसरी टीवी

अर्बन नक्सल एक बड़ी चुनौती पहचाने की जरूरत : नंदा

शिमला ब्यूरो सुभाष शर्मा 29/09/25

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अर्बन नक्सल एक बड़ी चुनौती पहचाने की जरूरत : नंद

 

• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मार्च 2026 तक नक्सल मुक्त होगा भारत : नंदा

• अर्बन नक्सल से लड़ने का लेना होगा संकल्प

 

शिमला, भाजपा प्रदेश मीडिया संयोजक कर्ण नंदा ने दिल्ली विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन भारत मंथन 2025, नक्सल मुक्त भारत में भाग लिया। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश से लाल आतंकवाद को जड़ से खत्म करने बारे विस्तृत मंथन हुआ।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री अमित शाह, भाजपा वरिष्ठ नेता मुरलीधर राव, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, स्निग्धा रेड्डी, आईपीएस प्रवीण वशिष्ठ, पूर्व डिजी सीआरपीएफ कुलदीप सिंह, वाइस चांसलर दिल्ली विश्वविद्यालय प्रो योगेश सिंह, फिलम मेकर विपुल शाह, बस्तर छत्तीसगढ़ आईजी पी सुन्दराज का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

कर्ण नंदा ने कहा कि अर्बन नक्सलवाद एक बड़ी चुनौती है और हम सब को नक्सलवाद की सोच को फैलाने वालों को पहचाने की अति आवश्यकता है। फिल्म बनकर इस सोच को आगे बढ़ना एक शक्तिशाली माध्यम है और इसके दूरगामी परिणाम है। बड़े पैमाने पर अनेकों शिक्षा संस्थानों में पिंजरा तोड़ अभियान भी चला था जो कि माओवादी सोचा का नतीजा था।

कर्ण नंदा ने कहा कि राष्ट्रीय भाजपा नेता मुरलीधर राव पर 1980 और 1986 में माओवादियों द्वारा दो बार अटैक किया गया था, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूराम मरांडी के बेटे को माओवादियों द्वारा मार दिया गया था। नक्सलवादी को देश का विकास नहीं चाहते अपितु यह भी मानते है कि लोकतांत्रिक से देश का भला नहीं हो सकता। रैडिकल स्टूडेंट यूनियन, पॉपुलर फ्रंट इंडिया और कैंपस फ्रंट इंडिया भी इसी सोच की एक उपज है जो कि भारत के तिरंगे का नाम नहीं रखती। उन्होंने कहा कि इनकी ऑडियोलॉजी जनता और युवाओं को भटकने वाली है, अगर देश को आने वाले एल समय में नक्सलवाद की सोच से बचाना है तो इसके देश को तोड़ने वाले इरादों को युवाओं तक पहुंचना होगा। देश में जबसे नरेंद्र मोदी सरकार बनी और केंद्रीय मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में एमएहए आर्मी की सुनती और सुझावों पर करती है इससे पूर्व में कांग्रेस सरकार फौज को सुना नहीं करती थी, अब हर महीने सीआरपीएफ जैसी अग्रिम फोर्स और अन्य सेनाओं की बैठक ली जाती है। 2010 में माओवाद अपने चरम पर था, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार में नक्सल प्रभाव देखने को मिला है।

2006 और 2012 के बीच केंद्र की सरकार ने कहा था कि नक्सल देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा है पर 2017 के बाद मोदी की केंद्र सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति ने नक्सल पर कड़ा प्रहार किया और आज माओवाद नक्सल सीजफायर की भीख मांग रहे है। केंद्र सरकार ने सीआरपीएफ को इस युद्ध के लिए आधुनिक हथियार दिए और कोबरा बटालियन का इस युद्ध में बड़ा रोल रहा। बस्तर जिला छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल का लालगढ़ इस नक्सलवाद से अतिग्रस्त रहा पर मोदी सरकार ने विकास और नौकरियों से जोड़ते हुए नक्सल पर बड़ा प्रहार किया।

आज तेज टेक्नोलॉजी के चलते नक्सल सोच ज्यादा नहीं चलेगी, इस कॉरिडोर के साथ 20 हजार करोड़ की लागत से 17500 किलोमीटर रोड बनाया जा रहा है जिसमें में 15000 किलोमीटर रोड बनकर तैयार हो गया है, 600 पोस्ट ऑफिस, 10500 मोबाइल टावर लगा दिए गए है। उन्होंने कहा कि विकास के सामने नक्सल सोच टिक नहीं पाएगी। कर्ण नंदा ने कहा कि दशकों से, वामपंथी उग्रवाद (LWE) भारत की सबसे क्रूर और गहरी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में से एक रहा है। जैसा कि अक्सर दिखाया जाता है, यह गरीबों का संघर्ष नहीं, बल्कि हिंसा और विनाश का अभियान बन गया है। विचारधारा के मुखौटे के पीछे, उन्होंने नागरिकों का नरसंहार, सुरक्षाकर्मियों की लक्षित हत्याएँ और बड़े पैमाने पर जबरन वसूली की। तथाकथित “लाल गलियारे” के माध्यम से सक्रिय, माओवादी उग्रवादी घरेलू और विदेशी, दोनों तरह के गुप्त वित्तपोषण माध्यमों से फलते-फूलते रहे। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, सड़कों और कल्याणकारी योजनाओं में व्यवस्थित रूप से बाधा डालकर, उन्होंने भारत को भीतर से कमज़ोर करने की कोशिश की, जिससे सबसे पिछड़े जिलों को विकास के वादे से वंचित रखा गया। अपने चरम पर, नक्सली हिंसा ने 10 राज्यों के 180 से ज़्यादा जिलों को पंगु बना दिया, जिससे देश के मध्य में भय का एक गलियारा बन गया। गाँव खाली हो गए, बच्चों को स्कूलों से वंचित कर दिया गया, और पूरे समुदाय असुरक्षा में फँस गए। विकास परियोजनाएँ, सड़कें, बिजली लाइनें, सिंचाई नहरें, हिंसा का बंधक बन गईं। अब तक, नक्सलवाद की क्रूरता में 16 हज़ार से ज़्यादा निर्दोष लोगों की जान जा चुकी है। जो फला-फूला, वह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि शोषण और ज़बरदस्ती थी। नक्सली नेता खुद को समृद्ध बनाते रहे, जबकि सबसे गरीब लोगों को खून-खराबे और ठहराव की कीमत चुकानी पड़ी। यह तथाकथित क्रांति, वास्तव में, भारत को धीरे-धीरे भीतर से विघटित करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास था।

उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, जब सरकार ने उग्रवाद की जड़ों पर प्रहार करने का फैसला किया, तो निर्णायक मोड़ आया। केंद्रीय मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने नक्सलवाद के विरुद्ध खंडित और रक्षात्मक रुख़ से हटकर एक एकीकृत, समग्र-सरकारी दृष्टिकोण अपनाया। अब, पीछे हटने के बजाय, सुरक्षा बलों ने इस खोखलेपन का लाभ उठाया और घने जंगलों और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों में, जो माओवादियों के गढ़ रहे हैं, गहराई तक पहुँच गए। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, राज्य पुलिस इकाइयों, ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा समन्वित अभियानों और वित्तीय अवरोधों के ज़रिए, उग्रवादियों के नेटवर्क को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया गया। गुमराह युवकों को आत्मसमर्पण करने का अवसर दिया गया, जबकि सुरक्षा कर्मियों ने आतंकवाद के नेतृत्व को ध्वस्त करने के लिए लगातार खुफिया जानकारी के आधार पर हमले किए।

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