“अन्न-जल का त्याग कर, संकल्प की ज्योत जलाई। शिव की भक्ति में लीन होकर, मुक्ति की राह बनाई।।” – भारत केसरी टीवी

“अन्न-जल का त्याग कर, संकल्प की ज्योत जलाई। शिव की भक्ति में लीन होकर, मुक्ति की राह बनाई।।”

शहर के प्रमुख राजनीतिज्ञ, समाजसेवी एवं धार्मिक प्रवृति के मालिक अमरनाथ बंसल जी के जीवन का यह अंतिम अध्याय केवल एक व्यक्ति की विदाई की गाथा नहीं है, बल्कि यह अगाध श्रद्धा, संकल्प की शक्ति और आध्यात्मिक चेतना का एक दुर्लभ उदाहरण है। 83 वर्षीय बंसल जी के जीवन के अंतिम 88 दिन किसी आश्चर्य से कम नहीं थे, जो सामान्य मानवीय समझ से परे ‘ईश्वरीय विधान’ का हिस्सा प्रतीत होते हैं।

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​महाप्रयाण: एक कर्मयोगी की अंतिम यात्रा
​30 जनवरी 2026 की वह पावन सुबह बंसल जी के संकल्प की पूर्णता का साक्षी बनी। जिस दृढ़ता के साथ उन्होंने 3 नवंबर 2025 को अन्न-जल का त्याग किया था, उसी अटलता के साथ उन्होंने अपने प्रारब्ध के कष्टों को हंसते-हंसते भोगा। जैसा कि उन्होंने अपने पुत्र सतीश बंसल से कहा था, उन्होंने अपने शरीर के दुखों को ईश्वरीय कृपा मानकर स्वीकार किया ताकि वे कर्मों के बंधनों से मुक्त होकर ‘परमात्मा के घर’ जा सकें।

​मौन साधना: 19 जनवरी 2026 से देह त्यागने तक उन्होंने मौन धारण कर लिया था। यह मौन सांसारिक मोह से विरक्ति और अंतर्मन की यात्रा का प्रतीक था।

​भक्तिमय परिवेश: उनके अंतिम दिनों में कमरा निरंतर भजन-कीर्तन से गुंजायमान रहा। उन्होंने अपनी अंतिम सांसें प्रभु की स्तुति सुनते हुए, पूर्णतः शांत और भक्तिभाव में लीन होकर लीं।

​संकल्प की सिद्धि: डॉक्टर, परिवार और मित्र, सभी के आग्रह के बावजूद उनका न डगमगाना यह सिद्ध करता है कि जब आत्मा परमात्मा से जुड़ जाती है, तो शरीर की भूख और प्यास गौण हो जाती है।

दादी मां का आशीर्वाद: अमरनाथ बंसल जी की इस आध्यात्मिक यात्रा में एक आलौकिक मोड़ तब आया जब 9 जनवरी 2026 को क्षेत्रीय अस्पताल में उपचार के दौरान उन्हें प्रातः काल दादी मां (सती माता, झुंझुनू वाली) के साक्षात दर्शन हुए। बंसल जी ने श्रद्धाभाव से अपने पुत्र सतीश बंसल को बताया कि माता ने उनकी अटूट भक्ति और कठोर संकल्प से प्रसन्न होकर उन्हें भरपूर आशीर्वाद दिया और कष्टों से मुक्ति व प्रभु चरणों में स्थान पाने का वरदान दिया। इस ईश्वरीय साक्षात्कार का अद्भुत प्रमाण तब देखने को मिला जब उसी शाम डॉक्टर अनुज गुप्ता के परामर्श पर बंसल जी ने दादी मां के स्वप्न-आदेशानुसार प्रसाद स्वरूप एक बिस्कुट और थोड़ी चाय ग्रहण की। अग्रवाल सभा सोलन के प्रधान दिनेश गर्ग की उपस्थिति में घटित यह घटना न केवल बंसल जी की सती माता के प्रति अनन्य आस्था को दर्शाती है, बल्कि यह भी सिद्ध करती है कि उनके 88 दिनों के कठिन व्रत को स्वयं दैवीय शक्ति का संरक्षण प्राप्त था।

​आध्यात्मिक संदेश: यह घटना दर्शाती है कि जब भक्त पूर्णतः समर्पित हो जाता है, तो स्वयं शक्ति (माता) उसका मार्गदर्शन करने और उसे ढांढस बंधाने आती हैं।
यह प्रसंग सिद्ध करता है कि बंसल जी की 88 दिनों की यात्रा केवल शारीरिक हठ नहीं थी, बल्कि ईश्वरीय कृपा से निर्देशित एक उच्च स्तरीय साधना थी।

खाटू श्याम जी के मंदिर निर्माण का संकल्प:
अमरनाथ बंसल जी की धर्मपरायणता और खाटू श्याम जी के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा का प्रमाण उनके द्वारा मंदिर निर्माण के लिए भूमि दान का संकल्प है। 19 मई 2022 को मुरारी मार्केट, सोलन में आयोजित भजन-कीर्तन के दौरान उन्होंने माँ शूलिनी मंदिर के समीप अपनी चार बिस्वा भूमि खाटू श्याम जी के मंदिर हेतु दान करने की घोषणा की थी। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी उन्होंने इस पुनीत कार्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और अपने पुत्र सतीश बंसल को इस संकल्प को पूर्ण करने की जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि मंदिर निर्माण की उनकी इस अंतिम इच्छा को अवश्य पूरा किया जाए।

गौ दान एवं गौ माता की पूजा:
अमरनाथ बंसल जी के जीवन का अंतिम पड़ाव गौ-सेवा और पूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक बन गया। सोमवार, 19 जनवरी 2026 को अस्पताल से घर लौटने पर उन्होंने गौ माता और बछड़े का दान किया। इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान वे अत्यंत भावुक हो उठे और पूर्ण आत्मसंतोष के साथ पंडित जी का आशीर्वाद लेकर गौ माता की भावपूर्ण स्तुति की। इस पूजन के पश्चात बंसल जी ने मौन धारण कर लिया और बाहरी जगत से विरक्त होकर स्वयं को पूरी तरह प्रभु भक्ति में लीन कर लिया। उनके कक्ष में निरंतर चलते भजन-कीर्तनों के बीच उनकी अवस्था ऐसी थी मानो उनका शरीर भले ही इस लोक में हो, किंतु उनका मन ईश्वर के सानिध्य और दिव्य कृपा को पाने के लिए पूरी तरह परलोक की यात्रा पर निकल चुका हो।

भगवान जगन्नाथ महाप्रभु का आशीर्वाद:
अमरनाथ बंसल जी के अंतिम समय में भगवान जगन्नाथ महाप्रभु की दिव्य कृपा का भी अद्भुत समावेश रहा। 20 जनवरी 2026 को, जब उनके पुत्र सतीश बंसल माँ शूलिनी के दर्शन हेतु गए, तब एक पारिवारिक मित्र के माध्यम से पुरी (ओडिशा) में बंसल जी के निमित्त विशेष पूजा अर्चना करवाई गई। पुरी से लौटे उस परिवार ने 29 जनवरी को बंसल जी के निवास स्थान पर महाप्रभु का विशेष प्रसाद और आशीर्वाद पहुँचाया। इस प्रकार, अपनी जीवन यात्रा के अंतिम क्षणों में बंसल जी को गंगाजल, खाटूश्याम जी के श्याम कुंड का जल और जगन्नाथ महाप्रभु का महाप्रसाद मिश्रित जल प्राप्त हुआ, जो उनकी आत्मा की शुद्धि और ईश्वरीय मिलन का परम सौभाग्य बना

अंतिम घड़ी:
बंसल जी के महाप्रयाण की वह अंतिम घड़ी भी उनके जीवन की तरह ही अत्यंत पावन और गरिमामय रही। 30 जनवरी 2026 को द्वादशी के शुभ दिन, आध्यात्मिक शांति के बीच उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूर्ण की। प्रातःकाल की पूजा के पश्चात जब उनके पुत्र सतीश बंसल ने कमरे में प्रवेश कर उनके चरणों में शीश नवाया और ‘राम-राम’ कर आशीर्वाद लिया, तो बंसल जी के मुख पर एक अलौकिक मुस्कान तैर गई। उसी क्षण, अत्यंत शांत भाव से ‘ओम नमः शिवाय’ का उच्चारण करते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। एक सच्चे शिव भक्त की भांति, प्रभु का नाम लेते हुए उनका देह त्यागना उनके 88 दिनों के कठिन तप और अटूट संकल्प की पूर्णता का प्रतीक बन गया।

​निष्कर्ष:
​अमरनाथ बंसल जी ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि यदि मनुष्य का जीवन निष्काम सेवा, निस्वार्थ प्रेम और धर्म के मार्ग पर आधारित हो, तो मृत्यु भय का कारण नहीं बल्कि एक उत्सव बन जाती है। 83 वर्ष की आयु और 88 दिनों का वह कठिन उपवास—यह केवल एक संयोग नहीं, बल्कि एक ‘सच्चे शिव भक्त’ की अपने आराध्य के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा थी।

​आज बंसल जी हमारे बीच भौतिक रूप में नहीं हैं, लेकिन उनका त्याग, उनकी समाज सेवा और उनकी अटूट इच्छाशक्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक स्तंभ बनी रहेगी। वे एक ऐसे ‘कर्मयोगी’ के रूप में सदैव याद किए जाएंगे, जिन्होंने न केवल जीवन को गौरव के साथ जिया, बल्कि मृत्यु का वरण भी उतनी ही शुचिता और गरिमा के साथ किया।

​”अन्न-जल के त्याग से आत्मा की शुद्धि तक, उनका सफर अब अनंत की यात्रा में विलीन हो गया है।”. शूलिनी समाचार डेस्क
ॐ नमः शिवाय

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