अदालत ने कहा- पिता का अपने बच्चों की शिक्षा के लिए समर्थन करना उनका नैतिक कर्तव्य है,बच्चों के वयस्क होने पर पोषण भत्ता वापस नहीं मांग सकते पिता – भारत केसरी टीवी

अदालत ने कहा- पिता का अपने बच्चों की शिक्षा के लिए समर्थन करना उनका नैतिक कर्तव्य है,बच्चों के वयस्क होने पर पोषण भत्ता वापस नहीं मांग सकते पिता

[MADAN SHARMA]

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि पिता अपने बच्चों के वयस्क होने के बाद उन्हें दिए गए भरण-पोषण भत्ते की वापसी की मांग नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि पिता का अपने बच्चों की शिक्षा के लिए समर्थन करना उनका नैतिक कर्तव्य है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की। अदालत के कहा कि वयस्क होने के बाद एक पिता होने के नाते भले ही उनका कोई कानूनी कर्तव्य न हो, लेकिन एक पिता के रूप में उनका नैतिक दायित्व और कर्तव्य है कि वह अपने बच्चों का भरण-पोषण सुनिश्चित करें।

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खासकर जब वह अपनी शिक्षा पूरी करने के कगार पर हों, क्योंकि बच्चों को दी गई अतिरिक्त राशि वापस करने का कोई भी आदेश याचिकाकर्ताओं के भविष्य की संभावनाओं को बाधित करेगा। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट मंडी के याचिकाकर्ता के दावे को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा है, लेकिन दूसरे याचिकाकर्ता को वयस्क होने तक बढ़ा हुआ भरण-पोषण पाने का अधिकार दिया है। फैमिली कोर्ट ने कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 भरण-पोषण करने में असमर्थ पत्नी, नाबालिग बच्चे या वयस्क बच्चे को भरण-पोषण का अधिकार देती है।

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अदालत ने कहा कि पिता का अपने बच्चों की शिक्षा के लिए समर्थन करना उनका नैतिक कर्तव्य है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की।

इसलिए वह केवल वयस्क होने तक ही भरण-पोषण के हकदार हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी बच्चा (वैध या अवैध) वयस्क होने से पहले अपने पिता से भरण-पोषण पाने का हकदार होता है। वयस्क होने के बाद केवल वही बच्चा भरण-पोषण पाने का हकदार होगा, जो शारीरिक या मानसिक असामान्यता या चोट के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो। अदालत ने दोहराया कि जहां हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम अविवाहित बेटी को भरण-पोषण का दावा करने की अनुमति देता है, वहीं सीआरपीसी की धारा 125 अविवाहित वयस्क बेटियों को कवर नहीं करती है।

याचिकाकर्ता प्रतिवादियों के बच्चे 2016 और 2020 में वयस्क हो चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि आर्थिक तंगी उनकी पढ़ाई में बाधा डाल सकती है। 2012 में न्यायिक मजिस्ट्रेट ने प्रत्येक को दो हजार प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया। 2015 में सेशन कोर्ट ने इसे बढ़ाकर तीन हजार कर दिया। 2017 में लोक अदालत ने इसे और बढ़ाकर 4 हजार कर दिया। 2018 में उन्होंने इसे और बढ़ाने की मांग की। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण के लिए 8 हजार की राशि स्वीकृत की, लेकिन बच्चों के दावे को खारिज कर दिया, क्योंकि वह वयस्क हो चुके थे। याचिकाकर्ताओं ने इसी फैसले को कोर्ट में चुनौती दी थी। वहीं, प्रतिवादी ने बच्चों के वयस्क होने पर भरण-पोषण भत्ते की वापसी की दलील थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।

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