आरडीजी समाप्त करना सरकार नहीं, प्रदेश के लोगों के अधिकारों का मुद्दा: मुख्यमंत्री सुक्खू – भारत केसरी टीवी

आरडीजी समाप्त करना सरकार नहीं, प्रदेश के लोगों के अधिकारों का मुद्दा: मुख्यमंत्री सुक्खू

[MADAN SHARMA]

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मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा है कि राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को समाप्त करना किसी सरकार का नहीं, बल्कि प्रदेश के लोगों के अधिकारों का मामला है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर भाजपा के सांसदों और विधायकों को भी साथ आकर केंद्र सरकार से बात करनी चाहिए।

मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री, हिमाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप पठानिया, मंत्रिमंडल के सदस्य, विधायक, प्रशासनिक सचिव, विभागाध्यक्ष, राज्य मीडिया सहित अन्य अधिकारियों के समक्ष वित्त विभाग द्वारा प्रदेश की वित्तीय स्थिति और आरडीजी समाप्त होने के प्रभावों पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी गई।

प्रस्तुति के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट का राज्य की अर्थव्यवस्था और आगामी बजट पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा,

“आरडीजी का समाप्त होना सरकार का नहीं बल्कि प्रदेश के लोगों के अधिकारों का मुद्दा है। हम भाजपा के सांसदों और विधायकों के साथ दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से मिलने को तैयार हैं। एक बार यदि आरडीजी का प्रावधान समाप्त हो गया तो लोगों के अधिकारों को वापस पाना बेहद कठिन होगा।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस प्रस्तुति में भाग लेने के लिए भाजपा विधायकों को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन दुर्भाग्यवश वे नहीं आए।

उन्होंने बताया कि 17 राज्यों का आरडीजी समाप्त किया गया है, लेकिन हिमाचल प्रदेश पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा है क्योंकि राज्य के बजट का 12.7 प्रतिशत हिस्सा आरडीजी से आता है, जो देश में दूसरा सबसे अधिक है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद कर संग्रहण की वृद्धि दर घटकर लगभग 8 प्रतिशत रह गई है, जबकि पहले यह 13 से 14 प्रतिशत थी। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश एक उत्पादक राज्य है, लेकिन जीएसटी एक उपभोक्ता आधारित कर होने के कारण राज्य की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। राज्य की जनसंख्या मात्र 75 लाख है और जीएसटी के बाद कर लगाने की राज्य की क्षमता भी सीमित हो गई है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमें मिलकर प्रदेश के लोगों के अधिकारों के लिए लड़ना होगा। उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार उन विद्युत परियोजनाओं पर कम से कम 50 प्रतिशत रॉयल्टी सुनिश्चित करे, जिनका ऋण पूरी तरह चुका दिया गया है, तथा 40 वर्ष की अवधि पूरी कर चुकी परियोजनाओं को राज्य को लौटाया जाए।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 से भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) के लगभग 4500 करोड़ रुपये के बकाया राज्य को नहीं दिए गए हैं, जबकि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आ चुका है। इसके अलावा, शानन विद्युत परियोजना की लीज अवधि समाप्त होने के बाद उसे वापस लेने के लिए राज्य सरकार पंजाब सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी लड़ रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश को आत्मनिर्भर राज्य बनाने का लक्ष्य रखा है और सत्ता संभालने के पहले दिन से ही इस दिशा में गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से 26,683 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि पर्यटन के अलावा राज्य के पास मुख्य रूप से नदियों और वनों से ही आय के सीमित स्रोत हैं।

मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा,

“हम राज्य की हर जनकल्याणकारी योजना को धरातल पर लागू करेंगे, संसाधनों में वृद्धि करेंगे और अपने वैध अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे।”

उन्होंने कहा कि संसाधन जुटाने के लिए नीतियां इस प्रकार बनाई गई हैं कि आम जनता पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने खुले वनों (ओपन फॉरेस्ट) का मुद्दा 16वें वित्त आयोग के समक्ष उठाया, जिसे आयोग ने स्वीकार कर लिया है। इसके अतिरिक्त, भूस्खलन से होने वाली आपदाओं के लिए भी विशेष फंड देने पर सहमति बनी है। पहले केवल सूखा और चक्रवात ही आपदा मद में शामिल थे।

इससे पूर्व उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के प्रभाव पर मंत्रिमंडल के समक्ष भी विस्तृत प्रस्तुति दी गई थी और इस पर गहन चर्चा हुई है। उन्होंने कहा कि वित्त विभाग ने हालात से निपटने के लिए केवल सुझाव दिए हैं और अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल द्वारा लिया जाएगा।

प्रस्तुति के दौरान राज्य के लिए आरडीजी के महत्व को विस्तार से समझाया गया। प्रधान सचिव वित्त देवेश कुमार ने बताया कि मुख्यमंत्री ने इस विषय पर कई बार वित्त आयोग के अध्यक्ष और केंद्रीय वित्त मंत्री से मुलाकात की है। उन्होंने कहा कि आरडीजी संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत एक प्रावधान है, जिसे 15वें वित्त आयोग तक राज्य को दिया गया।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2021 से 2026 के दौरान राज्य की आय 90,760 करोड़ रुपये और व्यय 1,70,930 करोड़ रुपये आंका गया था। 80,170 करोड़ रुपये के घाटे की पूर्ति केंद्रीय करों में हिस्सेदारी, आरडीजी और अन्य अनुदानों से की गई थी, लेकिन 16वें वित्त आयोग ने राज्यों की व्यक्तिगत आय-व्यय का आकलन ही नहीं किया।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में राज्य की स्वयं की आय लगभग 18,000 करोड़ रुपये है, जबकि अनिवार्य व्यय लगभग 48,000 करोड़ रुपये है, जिसमें वेतन, पेंशन, ऋण ब्याज व मूलधन, सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा पेंशन शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि केंद्रीय करों में हिस्सेदारी लगभग 13,950 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है और 10,000 करोड़ रुपये के ऋण को जोड़ने के बाद भी राज्य के पास लगभग 42,000 करोड़ रुपये ही उपलब्ध होंगे। आरडीजी समाप्त होने से बजटीय प्रावधानों को पूरा करना कठिन हो गया है।

उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि वर्ष 2026-27 में विकास कार्यों, लंबित देनदारियों और राज्य योजनाओं को छोड़कर भी लगभग 6,000 करोड़ रुपये का संसाधन अंतर बना रहेगा। उन्होंने कहा कि राजस्व बढ़ाने और खर्च घटाने के उपाय तुरंत लागू नहीं किए जा सकते और इसके बावजूद भी आरडीजी राज्य के लिए एक संजीवनी रहा है।

यही कारण है कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्यों को विशेष श्रेणी का दर्जा दिया गया था। हिमाचल प्रदेश का गठन जनता की आकांक्षाओं के आधार पर हुआ था, न कि वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर इकाई के रूप में। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों का प्रभाव केवल वर्तमान सरकार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली सरकारों और प्रदेश की जनता के लिए भी गंभीर अन्याय साबित होगा।

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